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धर्म

विवेक है शिव का तीसरा नेत्र 

Last updated: 2024/06/06 at 6:45 AM
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5 Min Read
विवेक है शिव का तीसरा नेत्र 
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शिव का अर्थ है कल्याण करने वाला पर उनका दूसरा प्रसिद्ध नाम रुद्र भी है क्योंकि वह दुष्टों को रुलाने वाले हैं। करोड़ों देवी-देवताओं में शिव ही हैं जिन्होंने 3 नेत्र धारण किए हैं। सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का दायित्व शिव के पास है। इस प्रकार शिव का एक नेत्र ब्रह्मा अर्थात सृजनकर्ता, दूसरा विष्णु अर्थात पालनकर्ता तीसरा स्वयं रुद्र रूप अर्थात संहारकर्ता। अन्य प्रकार से देखें तो पहला नेत्र धरती, दूसरा आकाश और तीसरा नेत्र बुद्धि के देव सूर्य की ज्योति से प्राप्त ज्ञान-अग्रि का प्रतीक है।
ज्ञान जब खुला तो कामदेव भस्म हुआ। अर्थात जब आप अपने ज्ञान और विवेक की आंख खोलते हैं तो कामदेव जैसी बुराई लालच, भ्रम, अंधकार आदि से स्वयं को दूर कर सकते हैं। इसके पीछे कथा भी है। एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव के पीछे जाकर उनकी दोनों आंखें हथेलियों से बंद कर दीं। इससे समस्त संसार में अंधकार छा गया क्योंकि भगवान शिव की एक आंख सूर्य है, दूसरी चंद्रमा। 
अंधकार से संसार में हाहाकार मच गया तब भोले भंडारी ने तुरन्त अपने माथे से अग्रि निकाल कर पूरी दुनिया में रोशनी फैला दी। रोशनी इतनी तेज थी कि इससे हिमालय जलने लगा। इस दृश्य को देखकर पार्वती घबरा गईं तथा तुरन्त अपनी हथेलियां शिव की आंखों से हटा दीं। तब शिव जी ने मुस्कुरा कर अपनी तीसरी आंख बंद की। शिव पुराण के अनुसार पार्वती जी को इससे पूर्व ज्ञान नहीं था कि शिव त्रिनेत्रधारी हैं। इनका दायां नेत्र सूर्य के समान तेजस्वी है। जिस प्रकार सूर्य में उत्पन्न करने की विशेष ऊर्जा है और वह पृथ्वी ही नहीं, अनेक ग्रहों को भी प्रकाशमय करता है। 
उसी प्रकार शिव का दायां नेत्र भी सृष्टि को जीवन दायक शक्ति प्रदान करता है। स्वयं सूर्य को भी शिव के इसी नेत्र से तेज मिलता है। वैदिक ग्रंथों में शिव एवं चंद्रमा का विशेष संबंध बताया गया है। जलतत्व सोम को अमृततुल्य माना जाता है। जीवन का पोषण जल ही करता है और यही जल तत्व शिव का बायां नेत्र है। शिव का तीसरा नेत्र जो बंद ही रहता है, अग्रि रूप है। यह वही अग्रि है जो सकारात्मक रूप में तो कल्याणकारी है परन्तु यदि इस पर अंकुश न लगाया जाए तो यही विनाश का कारण भी बनती है। शिव अपनी इस शक्ति पर नियंत्रण रखते हैं और इसका इस्तेमाल केवल बुराई के नाश के लिए ही करते हैं।
इस संबंध में एक कथा भी है। सृष्टि के समय जीव में रस की प्राप्ति के लिए कामदेव को जिम्मेदारी दी गई परन्तु जब कामदेव ने शिव पर ही अपनी शक्ति का परीक्षण करना चाहा तो शिव ने अपने तीसरे नेत्र की संहारक शक्ति का प्रयोग कर उसे तत्काल भस्म कर दिया। इसी प्रकार जीव को कर्म करने की स्वतंत्रता है और यदि वह अपने अंदर की बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार) पर अपने तीसरे नेत्र का अंकुश रखे, तो वह सदैव सुखी रहेगा परन्तु यदि वह इन पर अंकुश नहीं रख पाता तो यही उसका विनाश कर देती है।
शिव और शक्ति एक-दूसरे के पर्याय हैं। इसलिए शिव के तीनों नेत्र शिव का ही प्रतीक हैं, जो क्रमश: गौरी के रूप में जीव को मातृत्व का स्नेह देते हैं, लक्ष्मी के रूप में उसका पोषण करते हैं तथा काली के रूप में उसकी आंतरिक तथा बाहरी बुराइयों का नाश करते हैं। भगवान भोले भंडारी के ललाट पर सुशोभित तीसरा नेत्र असल में मुक्ति का द्वार है जो शिव को तो स्वत: प्राप्त है लेकिन मनुष्य अज्ञान के चलते इसे अपने मस्तक पर देख नहीं पाता। यह दोनों नेत्रों के मध्य इसलिए है क्योंकि यह स्थान पवित्र माना गया है। त्राटक के मध्य कुंडलिनी जागरण का भी विशेष महत्व है। यही स्थान सर्वाधिक ऊर्जावान है। इसी स्थान पर विशेष दबाव अपना प्रभाव दिखाता है। दूसरी ओर शिव के अधखुले नेत्र व्यक्ति के कर्म के साक्षी हैं। 
इसी कारण शिव को परमयोगी कहा जाता है। गृहस्थ में रह कर भी शिव सृष्टि का नियंत्रण, (सृजन, पालन तथा संहार) स्वतंत्र रूप में करते हैं। स्वयं पर नियंत्रण, अपने कर्मों का सही आकलन ही शिव के तीनों नेत्रों का रहस्य है। शिव का तीसरा नेत्र ही मुक्ति का द्वार है
 

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