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मनोरंजन

‘हनुमान अंश’ पर बरसी बाबा नीम करौली की कृपा! 32वें दिन 150 करोड़ पार हुई कमाई

News Desk
Last updated: 2026/09/08 at 2:26 PM
News Desk
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7 Min Read
‘हनुमान अंश’ पर बरसी बाबा नीम करौली की कृपा! 32वें दिन 150 करोड़ पार हुई कमाई
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मिर्जापुर’ का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? बंदूकें, गोलियां, खून, गालियां, गैंगवॉर और वो भौकाल, जिसके आगे अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है. लेकिन अगर आप इस फिल्म को सिर्फ इसी चश्मे से देखेंगे तो कहानी का एक बेहद दिलचस्प हिस्सा मिस कर देंगे. क्योंकि बंदूक की नोक पर दुनिया चलाने वाले इन बाहुबलियों के अंदर एक ऐसा दिल भी धड़कता है, जो प्यार के सामने पूरी तरह बेबस हो जाता है.

यही ‘मिर्जापुर’ का वो ह्यूमन एंगल है, जो खून-खराबे के बीच अचानक कहानी को एक अलग रंग दे देता है. फिल्म में भले ही कोई किसी के साथ इंटीमेट हो रहा हो, लेकिन दिल एक ही जगह अटका है.  

जहां बदले के पीछे छिपी है मोहब्बत
फिल्म में बीना यानी रसिका दुग्गल की कहानी को ही देख लीजिए. उसकी शादी अखंडानंद त्रिपाठी यानी कालीन भैया से होती है. बाहर से ये रिश्ता सत्ता और रसूख वाला दिखता है, लेकिन इसके पीछे एक पुरानी मोहब्बत सांस ले रही है.

बीना को वापस पाने के लिए बिर्जू लोहार (मोहित मलिक) का मिर्जापुर आना सिर्फ बदले की कहानी नहीं है. उसके पीछे अपना प्यार वापस पाने की जिद भी है. वो कालीन भैया को खत्म करना चाहता है, ताकि अपनी ‘छटंकी’ को वापस ले जा सके.

यानी जिस दुनिया में लोग सत्ता के लिए किसी की जान लेने से पहले एक सेकंड नहीं सोचते, उसी दुनिया में एक आदमी अपने प्यार के लिए पूरी व्यवस्था से भिड़ने को तैयार है.

गुड्डू, स्वीटी और मुन्ना… गोली से ज्यादा खतरनाक इश्क!

फिर आती है गुड्डू भैया, स्वीटी और मुन्ना भैया की कहानी!
गुड्डू भैया यानी अली फजल स्वीटी यानी श्रेया पिलगांवकर के प्यार में हैं. लेकिन कहानी यहां सीधी कहां रहने वाली थी? मुन्ना भैया यानी दिव्येंदु भी स्वीटी को चाहते हैं. बस यहीं से शुरू होता है वो लव ट्रायंगल, जिसमें बंदूकें भी हैं और धड़कनें भी.

गुड्डू के लिए स्वीटी सिर्फ मोहब्बत नहीं है, वो उसकी कमजोरी भी है और ताकत भी. वहीं मुन्ना के लिए उसे पाना सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि अपनी जीत जैसा भी है. दोनों की चाहत अलग है, लेकिन मंजिल एक- स्वीटी. और ‘मिर्जापुर’ की खूबसूरती यही है कि यहां प्यार भी उतना ही हिंसक हो सकता है, जितना सत्ता का खेल.

बब्बन यादव… बाहुबली कम, आशिक ज्यादा
लेकिन अगर इस फिल्म में किसी की मोहब्बत सबसे ज्यादा ‘आशिकाना’ लगती है, तो वो हैं बब्बन यादव यानी रवि किशन. बब्बन को अपनी मुमताज बेबी यानी सोनल चौहान से बेइंतहा मोहब्बत है. वो उसे अपने आसपास रखते हैं, उसकी हिफाजत करते हैं और उस पर कोई आंच नहीं आने देना चाहते.

अब यही बब्बन जब मुमताज को खो देता है, तो उसका प्यार एक टूटे हुए दिल में बदल जाता है. और टूटे हुए दिल वाला आशिक जब ‘मिर्जापुर’ की दुनिया में हो, तो उसके हाथ में गुलाब नहीं… बंदूक आती है. मुमताज की मौत के बाद बब्बन का पागलपन सिर्फ बदले की आग नहीं है. ये उस आदमी की कहानी है, जिसने अपनी दुनिया खो दी है और अब उसके पास खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं.

और फिर आते हैं बबलू पंडित. जब मिर्जापुर का हर बाहुबली किसी न किसी के प्यार में गिरफ्तार है, तो बबलू पंडित कैसे पीछे रहते?

उनका प्यार गोलू गुप्ता के लिए है. लेकिन इसमें न कोई शोर है, न कोई ऐलान. बस एक खामोश मोहब्बत है, जिसे वो अपने अंदर दबाकर रखते हैं. बबलू का ये साइलेंट लव बाकी कहानियों से इसलिए अलग लगता है, क्योंकि यहां प्यार पाने की जिद नहीं है. बस प्यार करने की खामोशी है. और शायद यही इसे सबसे ज्यादा इंसानी बना देती है.

असली खेल यही है… ये लोग सिर्फ बाहुबली नहीं हैं
‘मिर्जापुर’ के इन किरदारों को देखिए. हाथ में हथियार आते ही ये पत्थर बन जाते हैं. दुश्मन सामने हो तो रहम नाम की कोई चीज नहीं. गोली चलाने में देर नहीं, खून बहाने में झिझक नहीं. लेकिन प्यार सामने आते ही? यही लोग मोम की तरह पिघल जाते हैं.

कालीन भैया के साम्राज्य में सत्ता है, लेकिन रिश्तों में उलझन भी है. मुन्ना भैया के अंदर गुस्सा है, लेकिन प्यार पाने की बेचैनी भी. गुड्डू भैया के हाथ में बंदूक है, लेकिन दिल स्वीटी के लिए धड़कता है. बब्बन यादव लोगों के लिए खौफ हैं, लेकिन मुमताज के लिए एक दीवाना आशिक. और बबलू पंडित… वो तो अपने प्यार को कहने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते.

यानी ‘मिर्जापुर’ की दुनिया में आदमी चाहे कितना भी बड़ा बाहुबली क्यों न बन जाए, प्यार के आगे उसकी सारी अकड़ धरी की धरी रह जाती है.

मिर्जापुर की असली हिंसा सिर्फ बंदूकों में नहीं है
फिल्म का भौकाल अपनी जगह है. गाली-गलौच, खून-खराबा, गैंगवॉर और इंटीमेट सीन्स इसकी पहचान हैं. लेकिन इन सबके बीच प्यार की कहानियां एक दिलचस्प कॉन्ट्रास्ट पैदा करती हैं. यहां हिंसा सिर्फ शरीर पर नहीं होती, दिल पर भी होती है. किसी का प्यार छिन जाता है, कोई अपना प्यार पाने के लिए लड़ता है, कोई प्यार में हारकर बदला लेने निकल पड़ता है और कोई चुपचाप प्यार करता रहता है.

शायद यही वजह है कि ‘मिर्जापुर’ के बाहुबली किरदार सिर्फ ‘खूंखार’ नहीं लगते. उनके अंदर की कमजोरियां उन्हें इंसान बनाती हैं. क्योंकि बंदूक चलाने वाला आदमी भी आखिर दिल रखता है… और ‘मिर्जापुर’ में सबसे बड़ा भौकाल कई बार बंदूक का नहीं, टूटे हुए दिल का होता है.

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News Desk September 8, 2026 September 8, 2026
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