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देश

पति है, इसलिए रेप नहीं? 12 साल पुराना सवाल फिर सुप्रीम कोर्ट में, मैरिटल रेप पर अब क्या होगा फैसला

News Desk
Last updated: 2026/09/08 at 10:07 AM
News Desk
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7 Min Read
पति है, इसलिए रेप नहीं? 12 साल पुराना सवाल फिर सुप्रीम कोर्ट में, मैरिटल रेप पर अब क्या होगा फैसला
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नई दिल्ली

करीब 12 साल पहले एक शादीशुदा महिला अदालत पहुंची. उसका आरोप था कि उसका पति उसकी इच्छा के खिलाफ बार-बार शारीरिक संबंध बनाता है. लेकिन जब उसने न्याय की मांग की तो उसके सामने एक कानूनी दीवार खड़ी हो गई. कानून कह रहा था कि अगर ऐसा काम पति ने अपनी पत्नी के साथ किया है, तो उसे बलात्कार (Rape) नहीं माना जाएगा. यहीं से शुरू हुई बहस दिल्ली हाईकोर्ट से होते हुए अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की नई तारीख तय करने से फिलहाल इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि पहले केंद्र सरकार का पक्ष रिकॉर्ड पर आने दें. लेकिन कोर्ट की अगली तारीख आने से पहले बड़ा सवाल यह है कि आखिर Marital Rape पर बहस खत्म क्यों नहीं हो रही? क्यों यह मुद्दा हर कुछ साल बाद फिर देश के सामने खड़ा हो जाता है? 

दिल्ली हाईकोर्ट के जजों का फैसला भी बंटा था
इन सवालों का जवाब जानने से पहले एक चौंकाने वाला तथ्य समझिए भारत में अगर कोई पुरुष किसी महिला की इच्छा के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाता है, तो यह बलात्कार हो सकता है. लेकिन यदि वही महिला उसकी पत्नी है, तो भारतीय कानून में लंबे समय से एक अपवाद (Exception) मौजूद रहा है. यही "Marital Rape Exception" है, जिस पर पूरी लड़ाई टिकी हुई है. याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि "अगर सहमति ही रेप और सेक्स के बीच का फर्क है, तो शादी के बाद सहमति की अहमियत कैसे खत्म हो सकती है?"

इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में जज भी एक राय नहीं बना पाए.  मार्च 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर विभाजित फैसला दिया. एक जज ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार अपवाद संविधान के खिलाफ है. लेकिन दूसरे जज इससे सहमत नहीं थे। 

जाहिर है कि अदालत के भीतर भी मतभेद था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. यहीं से साफ हो गया कि यह केवल कानून का मसला नहीं, बल्कि समाज और संविधान के बीच टकरा रहे दो विचारों का सवाल है. जो Marital Rape को अपराध बनाने की मांग कर रहे हैं, वे क्या कहते हैं?

पक्ष में लोग ये तर्क देते हैं

    शादी किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता खत्म नहीं करती.
    संविधान सभी महिलाओं को समान सुरक्षा देता है.
    सहमति (Consent) हर रिश्ते में जरूरी है.
    पत्नी को कानून में कम सुरक्षा देना समानता के अधिकार के खिलाफ है.

और विरोध करने वाले क्या कहते हैं?

    दूसरा पक्ष कई चिंताएं उठाता है:
    विवाह संस्था पर असर पड़ सकता है.
    झूठे मामलों की आशंका बढ़ सकती है.
    पति-पत्नी के निजी विवाद आपराधिक मुकदमों में बदल सकते हैं.

29 फीसदी महिलाएं हुई हैं शिकार
भारत में Marital Rape के अलग अपराध का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, इसलिए NCRB के पास इसका सीधा डेटा मौजूद नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि शादीशुदा महिलाओं के खिलाफ यौन या शारीरिक हिंसा का कोई अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) की रिपोर्ट बताती है कि 18 से 49 वर्ष की आयु की करीब 29 फीसदी विवाहित महिलाओं ने अपने जीवन में कभी न कभी पति द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेलने की बात कही. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जिन महिलाओं ने यौन हिंसा की शिकायत की, उनमें अधिकांश मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं बल्कि उनका अपना पति था. यही आंकड़े बताते हैं कि Marital Rape पर बहस अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे वर्षों से मौजूद एक सामाजिक वास्तविकता है, जिस पर अब कानूनी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। 

दूसरी तरफ कानून की किताब में ऐसे मामलों को अलग अपराध की श्रेणी नहीं मिली हुई है. यही विरोधाभास इस पूरी बहस का केंद्र है. सुप्रीम कोर्ट के सामने भी मूल प्रश्न यही है कि अगर किसी महिला की सहमति के बिना सेक्स अपराध हो सकता है, तो क्या विवाह उस सहमति को स्थायी रूप से मान लेने का आधार बन सकता है?

घर की चारदीवारी के भीतर भी होती है हिंसा
अगर NCRB के व्यापक आंकड़ों को देखें तो भी एक तस्वीर सामने आती है. महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में हर साल सबसे बड़ी हिस्सेदारी 'पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता' (IPC 498A) से जुड़े मामलों की रहती है। 

दूसरे शब्दों में कहें तो महिलाओं के लिए खतरा हमेशा सुनसान सड़क या किसी अजनबी से नहीं जुड़ा होता, कई बार वह उसी व्यक्ति से जुड़ा होता है जिसके साथ वह अपना जीवन साझा कर रही होती है। 

यही वजह है कि Marital Rape की बहस केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं रह जाती. यह बहस उस बुनियादी प्रश्न में बदल जाती है कि भारतीय समाज विवाह को कैसे देखता है. यह भारतीय समाज की उस सोच से जुड़ा है जहां शादी को कभी अधिकार, कभी जिम्मेदारी और कभी पवित्र संस्था के रूप में देखा जाता है. लेकिन नई पीढ़ी एक अलग सवाल पूछ रही है कि "क्या किसी भी रिश्ते में, चाहे वह शादी ही क्यों न हो, सहमति से बड़ा कुछ हो सकता है?" शायद इसी सवाल का जवाब आने वाले वर्षों में भारत के कानून और समाज दोनों को तलाशना होगा। 

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