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देश

हिमाचल में घेपन झील टूटी तो 32 जगहों पर तबाही का खतरा, अब लगेगा Early Warning System

News Desk
Last updated: 2026/09/02 at 10:36 AM
News Desk
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8 Min Read
हिमाचल में घेपन झील टूटी तो 32 जगहों पर तबाही का खतरा, अब लगेगा Early Warning System
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केलांग.

नेपाल में चीन अधिकृत तिब्बत की पहाड़ियों में ग्लेशियर फटने से आई बाढ़ के कारण जान माल का भारी नुकसान हुआ है. ऐसे में अब हिमाचल प्रदेश के जिला लाहौल-स्पीति प्रशासन ने 4070 मीटर की ऊंचाई पर घेपन ग्लेशियल झील को लेकर जिला प्रशासन सतर्क हो गया है और झील के पानी की निगरानी की जा रही है. अहम बात है कि इस झील का आकार बीते कुछ सालों में 173 फीसदी बढ़ गया है।
जानकारी क अनुसार, अब झील के पास प्रशासन ने अर्ली वार्निंग सिस्टम लगा दिया है. डीसी लाहौल-स्पीति किरण भड़ाना ने बताया कि घेपन ग्लेशियल झील के जलस्तर और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की निरंतर निगरानी की जा रही है औऱ सी-डैक, तिरुवनंतपुरम के जरिये झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा. उन्होंने बताया कि यह प्रणाली सितंबर माह में स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है ।

उपायुक्त ने बताया कि सी-डैक की ओऱ से सिस्सू झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम का परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया है. इस दौरान झील से संबंधित आवश्यक आंकड़े एवं सूचनाएं सफलतापूर्वक प्राप्त की गईं. उन्होंने कहा कि घेपन झील पर भी इसी तकनीक के माध्यम से निगरानी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है. यह प्रणाली स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) से अंतिम स्वीकृति आदेश अपेक्षित हैं।

14 दिनों तक वैज्ञानिक अध्ययन करेगी विशेषज्ञ टीम
किरण भड़ाना ने बताया कि घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिमों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पांच विशेषज्ञों की टीम 1 सितंबर, 2026 को झील क्षेत्र का दौरा करेगी. विशेषज्ञ टीम लगभग 14 दिनों तक क्षेत्र में रहकर झील एवं इसके आसपास के क्षेत्रों का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण करेगी. उन्होंने बताया कि विशेषज्ञ टीम की ओर से घेपन झील क्षेत्र की मैपिंग, हिमस्खलन एवं भूस्खलन की दृष्टि से संभावित संवेदनशील क्षेत्रों का सीमांकन, झील की गहराई, जल प्रवाह तथा मौसम संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया जाएगा. इस वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तैयार विस्तृत रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को उपलब्ध करवाई जाएगी. डीसी उन्होंने यह भी बताया कि जिला प्रशासन की ओर से घेपन झील की वर्तमान स्थिति का प्रत्यक्ष अवलोकन करने के लिए सितंबर माह में एक अलग टीम भी झील क्षेत्र में भेजी जाएगी।

इसरो ने किया था आगाह
डीसी किरण भड़ाना ने बताया कि नवंबर 2023 में इसरो द्वारा विभिन्न माध्यमों से जिला प्रशासन को घेपन झील के बढ़ते आकार के संबंध में सूचित किया गया था. इसरो ने अवगत करवाया था कि झील का आकार सामान्य स्तर की तुलना में काफी बढ़ गया है तथा संभावित जोखिम को देखते हुए आवश्यक एहतियाती कदम उठाने की सलाह दी गई थी. उन्होंने बताया कि इसके बाद जुलाई 2024 में तत्कालीन उपायुक्त के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के 23 अधिकारियों एवं कर्मचारियों की टीम ने 4070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील का दौरा किया था. इस दौरान झील के संभावित रूप से फटने की स्थिति तथा उससे होने वाले संभावित नुकसान को कम करने के लिए आवश्यक उपायों पर विस्तृत अध्ययन किया गया और एक रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को प्रस्तुत की गई।

झील फटने की स्थिति में नुकसान कम
किरण भड़ाना ने कहा कि विशेषज्ञों की ओर से सुझाए गए उपायों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, जिला प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी संभावित आपदा की स्थिति में जन-धन की हानि को न्यूनतम किया जा सके तथा प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते बचाव एवं राहत कार्य शुरू किए जा सकें.
उन्होंने बताया कि घेपन झील के संभावित फटने की स्थिति में सिस्सू से हिमाचल प्रदेश की अंतिम सीमा तक 34 स्थानों को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है. इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओऱ से समय-समय पर आपदा से बचाव, त्वरित प्रतिक्रिया एवं आवश्यक सावधानियों के संबंध में जागरूक और प्रशिक्षित किया जा रहा है. इस प्रक्रिया में विभिन्न विभागों को भी शामिल किया जा रहा है, ताकि आपदा की स्थिति में प्रत्येक विभाग अपनी जिम्मेदारियों एवं भूमिका से पूरी तरह अवगत रहे ।

उन्होंने बताया कि सिस्सू और शाशिन गांव में स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दल का गठन भी किया गया है. इसके साथ ही आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जुड़े कार्यों को और गति प्रदान करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अतिरिक्त वित्तीय सहयोग की मांग की गई है।

32 संवेदनशील स्थानों पर होगी हाई फ्लड लेवल मार्किंग
उपायुक्त ने बताया कि घेपन झील की दूरी सिस्सू से लगभग 11 किलोमीटर है, जबकि झील से उदयपुर होते हुए जिले की अंतिम सीमा तक की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है. संभावित बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए जिले के संवेदनशील क्षेत्रों में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत हाई फ्लड लेवल मार्किंग का कार्य शुरू किया गया है. उन्होंने बताया कि एचएफएल मार्किंग का मुख्य उद्देश्य बाढ़ के संभावित स्तर को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना तथा आपदा जोखिम को कम करने के लिए जमीन पर एक स्पष्ट एवं स्थायी संदर्भ बिंदु उपलब्ध करवाना है. इसके लिए कुल 32 स्थानों की पहचान की गई है. उन्होंने कहा कि संवेदनशील स्थानों पर की जाने वाली मार्किंग से सामान्य एवं संभावित बाढ़ के स्तर का स्पष्ट संकेत मिलेगा. इससे नदी किनारे रहने वाले लोगों में बाढ़ के जोखिम को लेकर जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ आपदा की स्थिति में तैयारी एवं त्वरित प्रतिक्रिया को भी मजबूत किया जा सकेगा ।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की निगरानी के लिए विशेष समिति
उपायुक्त ने बताया कि सभी एहतियाती उपायों के अतिरिक्त जिला स्तर पर एक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया जा रहा है. इसमें विभिन्न विभागों के अधिकारी तथा पर्वतारोहण एवं संबंधित क्षेत्र के अनुभवी लोग शामिल किए जाएंगे. यह समिति घेपन झील एवं इसके आसपास के क्षेत्र का समय-समय पर फील्ड निरीक्षण करेगी तथा संभावित जोखिमों, जिनमें आसपास की ढीली चट्टानें एवं अस्थिर भू-भाग सहित अन्य संभावित खतरे शामिल हैं, का आकलन करेगी. समिति जोखिम कम करने की रणनीतियों, आवश्यक शमन उपायों तथा आपदा की स्थिति में प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक कार्ययोजना पर भी काम करेगी. उपायुक्त किरण भड़ाना ने कहा कि जिला प्रशासन वैज्ञानिक निगरानी, विशेषज्ञ अध्ययन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक प्रशिक्षण तथा विभागीय समन्वय के माध्यम से घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिमों को कम करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है. उन्होंने कहा कि प्रशासन का प्राथमिक उद्देश्य संभावित आपदा से पहले प्रभावी तैयारी सुनिश्चित करना और किसी भी आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है।

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