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छत्तीसगढ़राज्य

75 साल बाद भी रौशनी और मूलभूत सुविधाओं से वंचित है ये गांव

News Desk
Last updated: 2025/03/14 at 5:52 PM
News Desk
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6 Min Read
75 साल बाद भी रौशनी और मूलभूत सुविधाओं से वंचित है ये गांव
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खैरागढ़

भारत जहां एक तरफ लगातार विकास की सीढ़ियां चढ़ रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ का एक गांव आजादी के 75 साल बाद भी रौशनी और मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. यह गांव  मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है. यहां ग्रामीण पहले नक्सलियों के दहशत के साये में जीते रहे. आईटीबीपी कैंप की स्थापना के बाद यहां लोगों को सुरक्षा तो मिली, लेकिन सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहे हैं. वहीं सड़क बनाने के नाम पर ठकेदारों ने अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ कर केवल मिट्टी पाटी और सरकारी पैसे गबन कर लिए.

बता दें, घने जंगलों के बीच स्थित होने के कारण कतेमा गांव पहले नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, लेकिन आईटीबीपी (भारत-तिब्बत सीमा पुलिस) कैंप स्थापित होने के बाद नक्सल गतिविधियों पर बहुत हद तक लगाम लगी है. इसके बावजूद सरकारी योजनाएं इस गांव तक पहुंचने में नाकाम साबित हो रही हैं.

आजादी के 75 साल बाद भी अंधेरे में ग्रामीणों का जीवन
देश में चंद्रयान से लेकर बुलेट ट्रेन तक की चर्चा हो रही है, लेकिन कटेमा के लोगों को आज तक बिजली तक नसीब नहीं हुई. यहां 27 परिवारों में 156 लोग निवास करते हैं, लेकिन आज भी वे लालटेन और लकड़ी जलाकर रातें गुजारने को मजबूर हैं. बिजली के अभाव में टीवी, मोबाइल चार्जिंग और अन्य आधुनिक सुविधाएं यहां सपना ही लगती हैं. कुछ साल पहले गांव में सोलर पैनल लगाए गए थे लेकिन अब वो भी जर्जर हो चुके हैं.यहाँ के ग्रामीणों का जीवन बेहद कठिन है. राशन लेने के लिए 16 किलोमीटर जंगल के रास्ते पैदल चलना पड़ता है, क्योंकि यहां कोई दुकान या राशन केंद्र नहीं है.

शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति दयनीय
गांव में सिर्फ 5वीं तक की पढ़ाई की सुविधा है, इसके आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को 40 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र जाना पड़ता है. स्वास्थ्य सेवाओं का भी यही हाल है, गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है, जिससे ग्रामीणों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. कई बार बीमारों को जंगल के रास्ते खाट पर लादकर अस्पताल ले जाना पड़ता है. आईटीबीपी कैंप खुलने के बाद से प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा तो कैंप में मिल जाती है लेकिन बड़ी बीमारी के इलाज के लिए आज भी लोग भटकते रहते हैं.

सड़क निर्माण में घोटाला, आधा पैसा खा गए ठेकेदार-अधिकारी
सरकार ने कटेमा से घाघरा तक 11 किलोमीटर सड़क बनाने की योजना तैयार की थी, लेकिन यह भी भ्रष्टाचार का शिकार हो गई. आधा भुगतान पहले ही कर दिया गया, लेकिन सड़क का एक इंच भी निर्माण नहीं हुआ. ठेकेदार और अधिकारियों ने मिलीभगत करके सिर्फ जंगल की मिट्टी खोदकर सड़क पर डाल दी और सरकारी राशि हड़प ली. इतना ही नहीं, सड़क निर्माण में काम करने वाले मजदूरों को उनकी मजदूरी तक नहीं दी गई. गांव वालों का कहना है कि अगर यह सड़क ठीक से बन जाए, तो उनके लिए राशन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं थोड़ी सुलभ हो सकती हैं. लेकिन, अधिकारियों और ठेकेदारों की लूट ने उनके इस छोटे-से सपने को भी तोड़ दिया.

आईटीबीपी कैंप के बाद सुरक्षा सुधरी, लेकिन सुविधाएं जस की तस
एक साल पहले कटेमा में आईटीबीपी कैंप की स्थापना की गई थी, जिससे गांव में नक्सली गतिविधियां कम हुई हैं. अब ग्रामीण पहले की तुलना में ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण उनका जीवन अब भी कठिन बना हुआ है. सरकार हर गांव तक विकास पहुंचाने के दावे करती है, लेकिन कटेमा की हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है. क्या सरकार और प्रशासन इस गांव की सुध लेंगे, या कटेमा के लोग हमेशा की तरह अपने हक के लिए तरसते रहेंगे?

जानिए क्या कहते हैं जिम्मेदार:
इस मामले में  खैरागढ़ के उप वनमंडलाधिकारी मोना माहेश्वरी ने लल्लूराम डॉट कॉम को बताया कि सड़क निर्माण में गड़बड़ी का मामला सामने आया है, इसकी जांच कराई जा रही है जल्दी ही कार्रवाई की जाएगी.

वहीं सरपंच कमलेश वर्मा ने बताया कि लंबी घाटी और पहाड़ी के चलते अब तक कटेमा में बिजली नहीं पहुंच पाई है, लेकिन सरकार ने बिजली पहुचाने की पूरी तैयारी अब कर ली है जल्दी ही कटेमा में बिजली की व्यवस्था हो जाएगी. कटेमा, लक्षना ग्राम पंचायत का आश्रित गांव है

सड़क भी पिछले पंचवर्षीय योजना में बनी थी, लेकिन अब जर्जर हो गई हैं. इसका भी काम जल्द किया जाएगा. बड़ी पहाड़ियों और खराब रास्तो के चलते अब तक यहां का विकास रुका हुआ था, लेकिन अब जल्दी ही कटेमा में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हो जाएगी.

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